लखनऊ: लखनऊ की ठंडी सुबहों से दूर, बरेली सेंट्रल जेल की ऊंची दीवारों के भीतर आज भी एक आदमी सलाखों के पीछे बैठा है. उसका नाम है आजाद खान… नाम के बिल्कुल उलट जिंदगी जीने को मजबूर. उम्र 45 साल, लेकिन जवानी, सपने और भरोसा सब कुछ जेल की दीवारों में कहीं खो गया. साल 2000 की बात है. मैनपुरी जिले के छोटे से गांव व्योति कटरा में रहने वाले आजाद तब सिर्फ 21 साल के थे. एक रात पुलिस आई और उन्हें उठा ले गई. आरोप था डकैती का. न कोई गवाह, न कोई सबूत…बस शक. वही शक जो 24 साल की सजा बन गया.
जेल में दिन, हफ्ते, साल गुजरते गए. मां की आंखें इंतजार करते-करते सूख गईं, पिता दुनिया छोड़ गए. भाई मस्तान खान मजदूरी करता रहा, ताकि कभी-कभी जेल जाकर आजाद को थोड़ा सा सहारा दे सके. हर मुलाकात में एक ही सवाल अब कब छूटोगे? और हर बार वही जवाब- पता नहीं. आजाद ने अदालत में सात बार इकबालिया बयान दिए, लेकिन सच्चाई ये थी कि वो डर के मारे टूट चुके थे. उन्हें लगता था अगर बाहर गया तो उसे मार दिया जाएगा.
हाईकोर्ट ने बाद में साफ कहा- ये कबूलनामे अपराध नहीं, डर के कारण माने गए थे. 19 दिसंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष करार दिया. फैसले में कहा कि अभियोजन एक भी ऐसा सबूत नहीं दे सका जो आजाद को अपराध से जोड़ सके. कागजों में आजाद खान आजाद तो हो गया, लेकिन हकीकत? एक महीना बीत गया. फिर दूसरा… आजाद अब भी जेल में था. वजह? कोर्ट का निर्दोष करार देने का फैसला जेल तक नहीं पहुंचा. एक कागज बस एक कागज (बरी होने के आदेश की सर्टिफाइड कॉपी) के कारण जेल से वह रिहा नहीं हो पा रहे हैं. उसका 22 साल का भतीजा सोहेल खान यह सुनकर दुखी हो उठा. जेब में पैसे नहीं थे, लेकिन हौसले थे. भारतीय किसान यूनियन के सदस्यों के साथ लिफ्ट लेकर प्रयागराज पहुंचा. हाईकोर्ट के गलियारों में भटकता रहा, हर चेहरे से उम्मीद बांधता रहा. वहीं उसे वकील यनेन्द्र पांडेय मिले. आखिरकार उन्होंने कागज हासिल कर लिया. अब प्रमाणित पत्र को मैनपुरी अदालत में पेश करना होगा. तभी रिहाई होगी.
जेल की कोठरी में बैठे आजाद को अब भी नहीं पता कि बाहर की हवा कैसी होगी. 24 साल बाद दुनिया बदल चुकी है. मोबाइल, इंटरनेट, नए रास्ते… सब अनजान. लेकिन सबसे बड़ा डर ये है कि कहीं फिर कोई कागज न अटक जाए. भाई मस्तान की आंखों में आंसू हैं. वह कहते हैं कि मेरे भाई ने उस अपराध के लिए सजा काटी, जो उसने किया ही नहीं था.