अबुझमाड़ के ईकानार में धर्मांतरण विवाद

बीते दिनों अबूझमाड़ के इकनार गांव में धर्मांतारण विवाद इस कदर गहराया कि गांव दो हिस्सों में बंट गया।इकनार पहुंचविहीन गांव है यहां पहुचने के लिए घने जंगलों को चीरते हुए लगभग 4 किमी पैदल चलकर पहाड़ और नदी नाले पार कर पहुचा जाता है।और इसी गांव में मामूली कहासुनी से शुरू हुआ तनाव देखते ही देखते हिंसा में बदल गया। दो समुदायों के बीच जमकर मारपीट हुई, कई लोग घायल हो गए और हालात इतने बिगड़ गए कि आदिवासी रीति-नीति को मानने वाले ग्रामीणों ने मतांतरित परिवारों को गांव से बेदखल कर दिया। उनके घरों से सामान बाहर फेंक दिया
गया और उन्हें गांव छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। गांव में कुल 32 परिवार रहते हैं, जिनमें से दो परिवार ईसाई धर्म अपना चुके हैं। आदिवासी परंपराओं को मानने वाले ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले पांच वर्षों से इन परिवारों से आदिवासी रीति-रिवाजों में लौटने का आग्रह कर रहे थे, लेकिन मतांतरित परिवार किसी भी कीमत पर अपनी आस्था बदलने को तैयार नहीं हुए। आदिवासी समुदाय का आरोप है कि नक्सल आतंक के दौर में यही मतांतरित परिवार के कुछ सदस्य उन ग्रामीणों के खिलाफ नक्सलियों के पास शिकायत लेकर पहुंचे थे, जो अपनी पारंपरिक रीति-नीति और विकास कार्यों की मांग कर रहे थे। आरोप है कि इन शिकायतों के बाद नक्सलियों ने कई ग्रामीणों के साथ मारपीट की थी। वर्षों से भीतर दबा यह आक्रोश अब नक्सलवाद के खात्मे के बाद खुलकर सामने आ रहा है।
हिंसक झड़प के दौरान मतांतरित परिवार का एक सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे ओरछा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया है। वहीं, मतांतरित परिवार का कहना है कि उन्होंने किसी लालच, दबाव या प्रलोभन में आकर धर्म परिवर्तन नहीं किया। उनका दावा है कि लंबे समय तक बीमारी से जूझने और इलाज के लिए दर-दर भटकने के बाद जब वे ईसाई समुदाय के संपर्क में आए, तो उनकी और उनके परिजनों की तबीयत में सुधार हुआ। उनके अनुसार, आस्था परिवर्तन उनके लिए जीवन की नई शुरुआत थी, न कि किसी साजिश का परिणाम।यह मामला कोई अकेला नहीं है। इससे पहले कांकेर जिले के आमाबेड़ा में भी इसी तरह का विवाद सामने आ चुका है। नारायणपुर जिले के विभिन्न इलाकों से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं, जहां धर्मांतरण को लेकर तनाव, मारपीट और सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं हो रही हैं। कई बार इन विवादों की शुरुआत शव दफनाने के मुद्दे से होती है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद जब उसका बोधन बोधन नाग छोटेडोगार नारायणपुर अंतिम संस्कार या दफन गांव में करने की बात आती है, तो आदिवासी रीति-नीति को मानने वाले समुदाय मतांतरित व्यक्ति के शव को गांव की जमीन में दफनाने की अनुमति नहीं देते, और यहीं से टकराव भड़क उठता है, जो देखते ही देखते हिंसा में बदल जाता है।

